पिछले 1 अगस्त को पाटजात्रा पूजा विधान के साथ शुरू हुए बस्तर दशहरा समापन आज शनिवार को मावली माता की विदाई के साथ हुआ।बस्तर दशहरा में शामिल होने आई दंतेवाड़ा की मावली माता ओर माई दंतेश्वरी की डोली को उसी सम्म्मान व् सत्कार के साथ शनिवार को विदाई दी गई।

जगदलपुर ।75 दिनों से जारी बस्तर दशहरे का समापन हो गया है। पिछले 1 अगस्त को पाटजात्रा पूजा विधान के साथ शुरू हुए बस्तर दशहरा समापन बीते शनिवार को मावली माता की विदाई के साथ हुआ। बस्तर दशहरा में शामिल होने आई दंतेवाड़ा की मावली माता ओर माई दंतेश्वरी की डोली को उसी सम्म्मान व् सत्कार के साथ शनिवार को विदाई दी गई। जिस तरह 7 अक्टूबर मावली परघाव के दिन स्वागत किया गया था। पुष्प वर्षा,आतिशबाजी,सलामी,विशाल जनसमुदाय , बाजे गाजे ओर श्रद्धालुओं की नम आँखे माहौल को भक्ति व् आस्थामय बना दिया। 

श्रावण मास की अमावस्या से प्रारंभ होकर अश्विनी मास के शुक्ल पक्ष की तेरस तक यह पर्व चलता रहता है। इस दौरान काछिन गादी, जोगी बिठाई, रथ परिक्रमा, निशा जात्रा, जोगी उठाई, मावली परघाव, भीतर और बाहर रैनी, तथा मुरिया दरबार जैसी परम्पराओं का उत्साहपूर्ण आयोजन महोत्सव का प्रमुख आकर्षण होता है। मान्यता है कि भगवान राम ने अपने वनवास के लगभग दस साल दंडकारण्य में बिताए थे। छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका प्राचीन समय में दंडकारण्य के रूप में जाना जाता था।बस्तर अंचल में आयोजित होने वाले पारंपरिक पर्वों में बस्तर दशहरा सर्वश्रेष्ठ पर्व है। इसका संबंध सीधे महिषासुर मर्दिनी माँ दुर्गा से जुड़ा है। पौराणिक वर्णन के अनुसार अश्विन शुक्ल दशमी को माँ दुर्गा ने अत्याचारी महिषासुर को शिरोच्छेदन किया था। इसी कारण इस तिथि को विजयादशमी उत्सव के रूप में लोक मान्यता प्राप्त हुई। दशहरे में बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की विशेष पूजा की जाती है। दशहरा की काकतीय राजवंश एवं उनकी इष्टदेवी मां दंतेश्वरी से अटूट प्रगाढ़ता है। उनके लिए यहां एक भव्य रथ तैयार किया जाता है, इस रथ में उनका छत्र रखकर नवरात्रि के दौरान भ्रमण के लिए निकाला जाता है। यहां का ऐतिहासिक दशहरा राम की लंका विजय के लिए नहीं मनाया जाता है।

75 दिन तक चलने वाले बस्तर दशहरे के महत्वपूर्ण चरण और रीति रिवाज इस प्रकार हैं-

  • काछिनगादी-  स्तर दशहरा का प्रथम चरण है। काछनगादी का अर्थ होता है काछिन देवी को गद्दी देना। काछिनदेवी की गद्दी होती है काँटों की।  काँटों की गद्दी पर बैठकर काँटों को जीतने का संदेश देती हैं। काछिन देवी बस्तर के मिरगानो की कुलदेवी हैं। अश्विन मास की अमावस्या के दिन काछिनगादी का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इस कार्यक्रम के लिए राजा अथवा राजा का प्रतिनिधि संध्या समय धूमधाम के साथ जुलूस लेकर जगदलपुर के पथरागुड़ा मार्ग पर स्थिन काछिनगादी में पहुँच जाता था। आज दंतेश्वरी के पुजारी द्वारा इस कार्यक्रम की अगुवाई की जाती है।
  • नवरात्र जोगी बिठाई- जोगी बिठाने के लिए सिरासार के मध्य भाग मेंएक आदमी की समायत के लायक एक गड्ढा बना है। जिसके अंदर हलबा जाति का एक व्यक्तिलगातार ९ दिन योगासन में बैठा रहता है। बस्तर जनपद के ग्राम आमाबाल के जोगी परिवारके वशंज जोगी के रूप में नौ दिनों तक बैठते हैं. सिरासार भवन में मांझी-चालकी वपुजारी की मौजूदगी में जोगी को नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। इसके बाद उसे गाजे-बाजेके साथ कपड़ों के पर्दे की आड़ में सिरासार के पास स्थित मावली माता मंदिर ले जाताहै। जहां, चारों ओर पर्दा रखने के पीछे बुरी नजर से बचाना बताया जाता है।पुजारी के प्रार्थना उपरांत जोगी नौ दिनों तक साधना का संकल्प लेकर गड़ढे में बैठतेहैं। मान्यता है कि जोगी के तप से देवी प्रसन्न् होती हैं तथा विशाल दशहरा पर्वनिर्विघ्न संपन्न होता है। कहा जाता है कि पहले कभी दशहरे के अवसर पर एक कोईवनवासी दशहरा निर्विघ्न संपन्न होने की कामना लेकर अपने ढंग से योग साधना में बैठगया था। तभी से बस्तर दशहरा के अंतर्गत जोगी बिठाने की प्रथा चल पड़ी है।

  • रथ परिक्रमा- मावली पर घाव का अर्थ है देवी की स्थापना। अश्विनशुक्ल ९ को संध्या समय लगभग ५ बजे जगदलपुर स्थित सिरासार करते हैं। इसी दिन लगभग ९बजे रात्रि में मावली पर घाव होता है। इस कार्यक्रम के तहत दंतेवाड़ा सेश्रद्धापूर्वक दंतेश्वरी की डोली में लाई गई मावली मूर्ति का स्वागत किया जाता है।मावली देवी को दंतेश्वरी का ही एक रूप मानते हैं। मावली माता निमंत्रण पाकर दशहरापर्व में सम्मिलित होने जगदलपुर पहुँचती हैं। पहले इनकी डोली को राजा कुँवरराजगुरु और पुजारी कंधे देकर दंतेश्वरी मंदिर तक पहुँचाते थे। आज भी पुजारीराजगुरु और राजपरिवार के लोग श्रद्धा सहित डोली को उठा लाते हैं।

  • रैनी (भीतर रैनी तथा बाहर रैनी) – दशहरे के दिन भीतर रैनी और एकादशी केदिन बाहर रैनी की रस्म निभाई जाती है। दोनों दिन आठ पहियों वाला विशाल रथ चलता है।भीतर रैनी अर्थात विजयादशमी के दिन यह रथ अपने पूर्ववर्ती रथ की ही दिशा मेंअग्रसर होता है। इस रथ पर झूले की व्यवस्था रहती है। जिस पर पहले रथारुढ़ शासक वीरवेश में बैठा झूला करता थे।

  • रथ का चोरी होना- विजयादशमी के रथ की परिक्रमा जब पूरी हो चुकती हैतब आदिवासी आठ पहियों वाले इस रथ को प्रथा के अनुसार चुराकर कुमढ़ाकोट ले जातेहैं। बाहिर रैनी का झूलेदार रथ कुम्हड़ाकोट से चलकर धाने की ओर से सदर रोड होतेहुए सदर प्राथमिक शाला के निकट के चौराहे से गुज़रता है। सिंह द्वार तक पहुँचतेपहुँचते उसे रात हो जाती है। माड़िया जनजाति के आदिवासी रथ को चुरा का कुम्हाड़कोटनाम की जगह पर ले जाते हैं। बस्तर दशहरे की हर रस्म के लिए आदिवासियों की अलग-अलगजनजातियों को जिम्मेदारी दी गई,इस तरह हर जनजाति इसका हिस्सा बनतीहै। हालाकि, जब पहली बार बस्तर दशहरा मनाया गया तब माड़िया जनजाति को कोई कामनहीं दिया गया था जिससे वे नाराज हो गए और उन्होंने रथ चुरा लिया। जिसके बाद अगलेदिन बस्तर के महाराज को जाकर उन्हें मनाना पड़ा, उन्होंने महाराज को अपने साथ बैठकरखाना खाने को कहा. खाना खाने के बाद ही रथ वापस किया गया. इसके बाद रथ चोरी भीपरंपरा का हिस्सा बन गई।

  • मुरिया दरबार- अश्विन शुक्ल १२ को प्रातः निर्विघ्न दशहरा संपन्नहोने की खुशी में काछिन जात्रा के अंतर्गत काछिन देवी को काछिनगुड़ी के पासवालेपूजामंडप पर पुनः सम्मानित किया जाता है। इसी दिन शाम को सीरासार में लगभग ५ बजेसे ग्रामीण तथा शहराती मुखियों की एक मिली जुली आसंभा लगती थी। जिसमें राजा प्रजाके बीच विचारों का आदान प्रदान हुआ करता था। हालाकि, विगत कुछ वर्षों से छत्तीसगढ़ केमुख्यमंत्री मुरिया दरबार में विशेष रुप से आमंत्रित किये जाते हैंं और वह सभा मेंलोगों की समस्याओं को वहां सुनकर निराकरण भी करते हैं। इस सभा में विभिन्नसमस्याओं के निराकरण हेतु खुली चर्चा होती थी। इस सभा को मुरिया दरबार कहते हैं।

  • ओहाड़ी– बस्तर दशहरा के अंत में अश्विन शुक्ल १३ को प्रातः गंगा मुणा स्थितमावली शिविर के निकट बने पूजा मंडप पर मावली माई के विदा सम्मान में गंगा मुणाजात्रा संपन्न होती है। यह प्रथा पशु बलि के लिए जानी जाती थी। हालाकि यह प्रथा अबबंद सी हो गई है। इस कार्यक्रम को ओहाड़ी कहते हैं। पहले बस्तर दशहरा के विभिन्नजात्रा कार्यक्रमों में सैकड़ों शुमुंड कटते थे जात्रा का अर्थ होता है यात्राअर्थात महायात्रा (बलि)।


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